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Tuesday, 12 February 2008

गुडबाय लेनिन! ---- एक और जर्मन फ़िल्म

कल फ़िर से मैंने एक और जर्मन फ़िल्म देखा. अच्छी लगने लगी हैं जर्मनी की फिल्में कथानक और पेश करने का तरीका एकदम बांधे रखता है. जर्मन नहीं आती फ़िर भी सब- टाइटल में भी देख के मज़ा आ जाता है. यह फ़िल्म है - बर्लिन की दीवार के ढहने के समय और जर्मन गणराज्यों के एकीकृत होने के सालों में. किसी भी ऐतिहासिक घटना पर इससे बढिया satire (हिन्दी शब्द नही मालूम है!) और कोई नहीं हो सकता है. Rip Van Winkle-style satire है यह फ़िल्म. कहानी कुछ इस प्रकार है - नायक Alexander Kerner ने अपनी माँ को हमेशा एक पूर्वी जर्मनी के कट्टर समर्थक के रूप में देखा है. Alexander की माँ Christiane Kerne अपने बेटे को सरकारी विरोध रैली में देख के ८ महीने के लिए कोमा में चली जाती है. इन ८ महीनों में जर्मनी का एकीकरण हो जाता है. इस एकीकरण के साथ सतह सामाजिक और राजनितिक बदलाव को तो Alexander गले लगा लेता है. माँ की बिगड़ती हालत के कारण Alexander और उसके साथियों को माँ के पुराने कमरे और पुराने समय में लौट के आना पड़ता है. बेटा अपनी माँ के लिए सच्चाई से अलग पूरी दुनिया बसा देता है जो पुराने समय में टिकी हुई है. कुछ कथानक बेजोड़ हैं - पूरी की पूरी न्यूज़ बनाईं जाती है.... पुराने पूर्वी जर्मनी के हिसाब से. पुराने पूर्वी जर्मनी के उत्पादों को माँ के लिए खोज निकालना, कोका कोला के बिल्ल्बोर्ड को माँ से छुपा के रखना. जिस बदलाव के लिए Alexander लड़ाई करता है ... बदलाव आने पर उसी बदलाव को छुपाना की कोशिश करता है.इस फ़िल्म में राजनितिक अंडरटोन बहुत कम है.

एक बेटा का माँ के लिए प्यार और जटिल राजनितिक दशा और दृश्य इस फ़िल्म को उत्कृष्ट बनती है. कुछ सवाल यह फ़िल्म छोड़ जाती है हमारी जेहन में - हम क्या क्या कर सकते हैं अपनों के लिए - उनकी ज़िंदगी बचाने के लिए? हमारी सोच, विचारधारा, पैसे, भौतिकवादी जरूरतों या कहें तो आज़ादी से भी ज्यादा अहम् क्या हैं? हमारा झूठ कब झूठ नहीं है या हमारा छल-कपट कब छल-कपट नहीं है? थोड़े सब्दों में कहने की कोशिश की जाए तो - यह फ़िल्म आपको रुलाती है, हँसाती हैं और बिना पक्ष लिए एक सोच छोड़ के चली जाती है. कोई घटना या पात्र इतिहास नहीं बांटे हैं - हम आप जैसे छोटे लोगों भी अपना इतिहास बनाते हैं और हमें ही झेलना पड़ता है.

Monday, 11 February 2008

एक अच्छी फ़िल्म - नोवेयर इन अफ्रीका (Nirgendwo in Afrika)

"One family's tale of a homeland lost... and a homeland found. "यह कहानी है, एक अपारम्परिक यहूदी परिवार की जो अपनी दूरदर्शिता से विश्व युद्ध के पहले जर्मनी छोड़ सकने में सफल हो जाता है. यह परिवार केन्या को अपना घर बनाने की कोशिश करता है. और यहाँ से शुरू होती है एक संवेदनशील फ़िल्म. यह एक बहुभाषीय फ़िल्म हैं और अफ्रीकी, जर्मन, यहूदी जैसे संस्कृति को जीवंत किया है. इस फ़िल्म के ज्यादातर संवाद जर्मन और स्वाहिली में हैं - थोड़ा अंग्रेज़ी भी है. पर सब-टाइटल इतने बखूबी में लिखे हुए हैं कि फ़िल्म कि सार्थकता कम नहीं हो पाती है. इसे २००२ के सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म का ओस्कर मिला है. पूरी कहानी एक बच्ची के द्वारा बयान कि गई है - पेशे से वकील Walter अपनी पत्नी Jettel और बच्ची Regina के साथ जर्मनी से भाग के केन्या में शरण लेते हैं. वाल्टर एक अंग्रेज़ के फार्म पर काम करने लगता है - जहाँ पानी जैसे मौलिक आवश्यकता की भारी कमी है. आदर्शवादी बाप और बच्ची समय और स्थान से समझौता कर लेते हैं और नई ज़िंदगी को अपना पाते हैं. दोनों स्वाहिली सीखते हैं, स्थानीय संस्कृति और लोगों से सामंजस्य बिठाते हुए ज़िंदगी अपना लेते हैं. माँ अपने पुरानी यादें, छोड हुए घर और वहाँ के लोगों, ऐशोआराम के सोच को नहीं छोड़ पाती है. माँ जर्मनी से जरूरी चीजों की जगह अपने लिए खूबसूरत कपड़े और बर्तन लेके आई हैं और घर पर जर्मनी बोलने पर ही जोर देती है. सबसे आकर्षक जेत्तेल का चरित्र है - जो एक स्वाधीन और परिपक्व सोच बना पाती हैं जीवन और परिवार के बारे में.
इस फ़िल्म में दिल को छू लेने वाले कथानक हैं. ओवुरा - जो पारिवारिक बावर्ची और जेत्तेल का संवाद. १२ सीलिंग कमाना और साहब और मेमसाहब के घर काम करना उससे पारिवारिक इज्ज़त देता है. वही घर से ओवुरा का घर, तीन बीवी और ६ बच्चों से दूर रहना फ़िर भी इज्ज़त पाना और उसकी छोटी जरूरतें झील की मछलियों से पूरा हो जाना. पश्चिम और पूरब के द्वंद को समझाने की कोशिश करता है. वहीं, पति-पत्नी और शादी के कई आयाम को सही सही चित्रित किया है. रेगिना का अपने अंग्रेज़ प्रिंसिपल से बातचीत - जिसमें वो कहती है की वह पढने में इसलिए अच्छा करती है क्यूंकि उसके पिता ६ पौंड की आय में ५ पौंड की फीस देते हैं. यहूदी बच्चों से अंग्रेज़ मिशनरी स्कूल में अलग सा बर्ताव. एक मज़बूत कहानी और पत्रों के साथ यह फ़िल्म प्रवासी परिवारों के दोहरी ज़िंदगी से अलग होने और स्थानीय जीवन को आत्मसात करने की सीख दे जाती है. अन्तिम दृश्य तो बहुत ही खूब है. समूची फ़िल्म, कैमरा और दृश्य १९४० के केन्या के जान पड़ते हैं.